किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने और उसकी गिरफ्तारी को दर्शाने के समय को लेकर पुलिसिया कार्रवाई के बारे में अक्सर सवाल उठते रहे हैं। दरअसल, यह व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार होने के बावजूद, इसकी अनदेखी की जाती रही है। यही वजह है कि अब इस मामले मे देश की शीर्ष अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा है। शीर्ष अदालत का फैसला कहता है कि किसी भी हिरासत में लिए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समय-सीमा, गिरफ्तारी के औपचारिक रिकॉर्ड से नहीं, बल्कि हिरासत में लिए जाने वाले पल से ही शुरू हो जाती है। सही मायने में, यह निर्णय आम भारतीय की संवैधानिक स्वतंत्रता की समयोचित पुष्टि ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है कि पुलिस मौलिक अधिकारों से बचने के लिये प्रक्रियाओं में हेरफेर नहीं कर सकती है। संविधान के अनुच्छेद 22(2) के उद्देश्य से हिरासत और गिरफ्तारी के बीच किए गए बनावटी अंतर को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक गंभीर खामी को दूर किया है। इस खामी का लाभ उठाकर ही जांच व प्रवर्तन एजेंसियां लोगों को बिना किसी त्वरित न्यायिक निगरानी के हिरासत में रख सकती थीं। दरअसल, नशीले पदार्थों से जुड़े एक मामले में हिरासत में लिए गए चार लोगों से जुड़े इस प्रकरण ने, हिरासत में लेने और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच 18 घंटे के अंतराल की विसंगति को उजागर किया है। जिसका कोई स्पष्ट कारण भी नहीं बताया गया था। वास्तव में गिरफ्तारी दिखाने में की गई यह देरी पुलिस को मनमाने ढंग से ताकत के इस्तेमाल और हिरासत में दुर्व्यवहार का मौका देती है। इसमें दो राय नहीं कि अक्सर आरोप लगते हैं कि गिरफ्तार व्यक्ति से मारपीट की गई और लंबी पूछताछ की गई। निस्संदेह, यह स्थिति भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की छवि पर एक सवालिया निशान लगाती है। हमारा संविधान किसी भी व्यक्ति को न्यायिक जांच के बगैर हिरासत में रखे जाने के खिलाफ सुरक्षा की गारंटी तो देता है, लेकिन यह सुरक्षा जांच अधिकारियों के रहमो-करम के भरोसे नहीं रह सकती है। यही वजह है कि देश की शीर्ष अदालत को दो टूक शब्दों में कहना पड़ा कि किसी को हिरासत में लिये जाने की 24 घंटे की समय सीमा में केवल मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाले उचित समय को ही घटाया जा सकता है। यहां उल्लेखनीय है कि मजिस्ट्रेटों को भी स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि वे हिरासत में लिए जाने के वास्तविक समय को ही दर्ज करें। साथ ही यह भी कि वे स्वतंत्र रूप से इस बात की जांच करें कि क्या किसी व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने की प्रक्रिया में संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन वास्तविक रूप से किया गया है। इसके साथ ही जरूरी है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण भी स्वतंत्रता के गैर-कानूनी हनन के खिलाफ एक कानूनी प्रभावी उपाय बना ही रहना चाहिए। सही मायने में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला, विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में भी न्याय व्यवस्था के लिये एक मार्गदर्शक का कार्य करेगा। जहां अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद के लगभग चार वर्षों में प्रिवेंटिव डिटेंशन को चुनौती देने वाली दो हजार से अधिक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर की गई थीं। इस बात में दो राय नहीं हो सकती हैं कि जब कानूनी प्रावधान के क्रियान्वयन में देरी होती है, अथवा जवाबदेही पर्याप्त नहीं होती है, तो संवैधानिक स्वतंत्रता प्रभावहीन होकर रह जाती है। निस्संदेह, किसी भी तरह के अपराध के खिलाफ मजबूत लड़ाई लड़ी जानी चाहिए, ताकि समाज में कानून का राज्य स्थापित हो सके। लेकिन इसका अर्थ मौलिक अधिकारों को कमजोर करना कदापि नहीं होना चाहिए। बहरहाल, अदालत के निर्देश का सार यह भी है कि पुलिस को कानून के दायरे में रहकर ही कोई भी जांच करनी चाहिए। साथ ही इस मामले में अदालतों को भी सतर्क रहना चाहिए। यह सर्वमान्य सत्य है कि स्वतंत्रता महज प्रक्रियात्मक औपचारिकता भर नहीं है। सही मायने में यह किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है।
